न जाने किस मनहूस घड़ी में मुझे उस पर इतना प्यार आया था कि उसे अपनी पसंदीदा किताब तोहफ़े में दे दी। आज न वो किताब मेरे पास है, न वो इंसान। लेकिन उस लम्हे को मनहूस कहना सही नहीं है। कुछ तो सोचा होगा मैंने। शायद ये कि क्या पता वो जल्द ही पढ़ कर वापस कर देगा या फिर ये कि हम इतने लंबे समय तक साथ रहेंगे कि किताब उसके पास हो या मेरे, एक ही बात होगी।
मुझे पीछे मुड़ कर देखना पसंद नहीं है, क्योंकि मुझे कमज़ोर नहीं साबित होना। फिर भी सब कुछ खत्म हो जाने के बाद भी जब उसने एक बार मिल लेने को कहा तो मैं मान गई। स्वार्थी हो गई थी मैं। सोचा बातों-बातों में किताब का ज़िक्र कर दूंगी तो वो खुद ही वापस लौटा देगा। एक बार को सोचा भी नहीं कि ये कितनी ओछी हरकत होगी।
मुझे बस अपना एक टुकड़ा ऐसे इंसान के पास छोड़ना नागवार गुज़र रहा था जो मुझे कभी समझ ही नहीं पाया।
वो कोई नई किताब नहीं थी। बाज़ार से महंगी से महंगी चीज़ खरीद कर लाना और किसी को दे देना आसान होता है। क्योंकि वो चीज़ अभी आपकी नहीं हुई होती है। उसमे जान नहीं होती है। उसमें आप नहीं होते हैं।
वो किताब मेरी थी, मैंने पढ़ी थी, अपनी पसंदीदा पंक्तियां रेखांकित की थीं और शायद कुछ लिखा भी होगा। शायद वो कभी समझ नहीं पाया कि किसी को अपनी मनपसंद किताब तोहफ़े में देने का क्या मतलब होता है।
हम कभी नहीं मिले दोबारा। अब मेरी किताब हमेशा उसके पास रहेगी। ‘मेरी’ इसलिए कह रही हूं क्योंकि उसके पहले पन्ने पर मेरा नाम लिखा है। एक नाकाम कोशिश उसपर अपना हक जमाने की। काश इतना आसान होता किसी को अपना बनाना, बस नाम लिख दो।
दिलचस्प बात है कि उस किताब में उसका नाम भी है। मैंने नहीं लिखा है, पहले से ही था। उस कहानी का एक हिस्सा।
उस कहानी का एक वाक्या बखूबी याद है मुझे। उसका मतलब भी अब ज़्यादा बेहतर समझ में आता है।
हुआ कुछ यूं था कि खां साहब फुन्नन मियां को अपनी ग़ज़ल सुना रहे थे। लेकिन इस ग़ज़ल के एक शेर को सुन कर फुन्नन मियां चौंक पड़े और बोले, “साहब हम कोनो पढ़े लिखे त हैं नहीं। बाकी आशिक के वास्ते सर उठाने का महावरा कुछ समझ में न आया। ऊ सर कटा सकता है, मंसूर बनकर, सरमद बनकर। ऊ ईसा बनकर सूली पर चढ़ सकता है। बाकी ऊ सर नहीं उठा सकता। सर उठाना तो मोहब्बत का कच्चापन साबित करता है, जैसे ऊ को अपनी मोहब्बत की अकड़ है।”
धूप आए तो छांव तुम लाना ख्वाइशों की बारिशों में भीग संग जाना
“चलो साई बोर्ड, 10 नंबर, सिवाय कॉम्प्लेक्स”, चलती बस से उतरकर कंडक्टर चिल्ला रहा है।
आ गई बस। तिल रखने की भी जगह नहीं है। लेकिन अभी कम से कम 15 सवारी और चढ़ सकती हैं। और चढ़ेंगी। क्योंकि नहीं चढ़ेंगी तो कैसे जाएंगी?
रोज़ की तरह मैं भी उस नई माचिस की डिब्बी नुमा बस में चढ़ गई जो नाक तक भरी होने की वजह से खुल नहीं पाती।
बाहर से देखने वालों को लगेगा कि इस बस में सीटें हैं ही नहीं। जिसको जहां जगह मिली वहां खड़ा हो गया। मैं भी।
कंधे पर लैपटॉप वाला बैग एक हाथ में किराया और दूसरे हाथ से हैंगर पकड़ने के बाद समझ नहीं आ रहा था कि कैसे जेब से फोन निकालकर अरिजित सिंह की आवाज़ तेज करूं ताकि बस वाले के पसंदीदा कुमार सानू की आवाज़ मुझे सुनाई न दे। कुमार सानू से कोई गुरेज़ नहीं है मुझे लेकिन अभी मैं दुखी हुं और बेहद परेशान भी, ऐसे में कुमार सानू का हँस के आशिकी के लिए बस एक सनम तलाश करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा। अब ये कमबख्त इयरफोंस बदल लेने चाहिए मुझे। कोई बटन काम नहीं करता इनमें…
और तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे पेट में किसी ने चाकू घुसेड़ दिया और अब वो उसे दाएं-बाएं दाएं-बाएं घुमा रहा है। मुझे अपने शरीर से खून बहता हुआ भी महसूस हुआ…
पीरियड्स। पहला दिन।
जिया जाए ना जाए ना जाए ना… चांद की ज़रूरत हो जैसे चांदनी के लिए…
“हां बोलो”, कंडक्टर ने टिकट के लिए पैसे मांगे। इस कंडक्टर का आज पहला दिन है शायद। इसे अभी हर जगह का किराया अपने बच्चों के नाम की तरह याद नहीं है। हाथ में रेट लिस्ट ले के घूम रहा है।
काम पर पहला दिन…और तीन महीने के बाद पहला दिन… उफ्फ।
टिकट लेने के बाद बस में सफ़र करने का पहला पड़ाव पूरा हुआ और मेरा एक हाथ भी खाली हो गया जिससे मैंने अरिजित सिंह को थोड़ी ऊंची आवाज़ में गाने के लिए प्रेरित किया।
अब इस बस में ठूंसे हुए 50 लोगों से मुझे कोई मतलब नहीं था। सिर्फ मैं, अरिजित, और वो..
आज भी नहीं दिखा वो। चार दिन हो गए। कहां चला गया? तीन महीने हो गए यहां इंटर्नशिप करते हुए, आज तक सिवाय हर शनिवार के किसी दिन ऐसा नहीं हुआ कि वो दिखा ना हो।
तीन महीने….अब घुटन हो रही है यहां। काम सिखाने के नाम पर बंधुआ मजदूर बना लेते हैं। नौकरी का लालच देके, एक्सपीरियंस नाम की लॉलीपॉप थमा के सारा काम करवाने लगते हैं। लेकिन हर दुविधा का हल होता है। यहां भी है। छोड़ दे। मत कर । किसने बोला? आखिर मेंटल हेल्थ नाम की भी एक चीज़ होती है। हां होती तो है लेकिन साला बहुत हाई मेंटेनेंस चीज़ है। प्रैक्टिकल नहीं है। और जो प्रैक्टिकल नहीं है वो ज़रूरी नहीं है।
कैसे छोड़ दूं? ड्रीम जॉब ड्रीम कंपनी, ऐसा कुछ भी तो होता है न। मिल जाएगी नौकरी, बहुत आसानी से, दूसरे नंबर के संस्थान में। ऐसा सब बोल रहे हैं। लेकिन इस निर्लज्ज ‘उम्मीद’ नाम की चिड़िया का क्या करूं जो हर दिन अपनी बहन ‘आशा’ के साथ मेरे हारे हुए मन के टूटे-फूटे झरोखे पे गाना गा के जाती है।
क्या पता आज वो दिन हो जब सर बोले, “कल से ज्वाइन कर लेना।” कहीं मैं ज़रा सी मेहनत से चूक न जाऊं। कहीं मेरा च… चांदनी रात में, गोरी के साथ में… ये अरिजित सिंह के बीच में टोनी कक्कड़ कहां से आ गया। स्पोटिफाई भले ही मेरी पसंद-नापसंद को मेरे मां बाप से ज़्यादा जानता हो, लेकिन कभी-कभी ये भी गलती कर देता है।
अरे मम्मी! ड्राइवर ने अचानक से ब्रेक लगा दिया। सामने वाली लड़की से इतनी तेज सिर टकराया की लगा चश्मा आँखों में समा जाएगा। स्कूटी वाला मरते-मरते बचा है। लेकिन मजाल की ड्राइवर अपनी गलती मान ले। आज की आखिरी बस है ये जितनी जल्दी ड्राइवर को घर जाने की है उतनी इस बस में शायद ही किसी और को होगी। थोड़ी बहुत नोंक-झोंक के बाद बस फिर से चल दी।
मम्मी घर बुला रही हैं, हमेशा की तरह। जाने का मन भी हो रहा है। लेकिन इस बार भी बिना कुछ हासिल किए नहीं जा सकती। क्या जवाब दूंगी जब पापा पूछेंगे क्या मिला ये कोर्स कर के? “पता तो मुझे भी नहीं है पापा, मैं भी इंतज़ार ही कर रही हूं कुछ मिलने का।”
तीन साल बर्बाद कर दिए क्या इस कोर्स में? नीट, बी.टेक में से ही कुछ कर लेना था। कम से पता तो रहता कि दूसरा ऑप्शन पंखा है। थोड़ी सहानुभूति भी मिल जाती कि इतना प्रेशर रहता है पढ़ाई का, क्या करे बेचारा बच्चा। इस फील्ड में तो पढ़ाई का प्रेशर भी नहीं, कोर्स भी खुद ही चुना था। और पत्रकारिता के छात्रों को तो पहले से ही फेलियर समझा जाता है। कुछ नहीं मिल रहा था तभी यहां आए हैं। नहीं… सब कुछ मिल रहा था तब भी यहां आए हैं… क्योंकि…क्योंकि शायद दिमाग खराब था।
यहां आप लाख पढ़ने में अच्छे हों फिर भी फ्लॉप साबित हो सकते हैं। मेहनत से ज़्यादा टैलेंट की लड़ाई है। अब कहां से लाऊं वो टैलेंट जो तीन साल पहले मुझे लगा था कि मेरे अंदर है। और शायद है भी पर काफी नहीं है।
छोड़ो हटाओ यार, हिमेश रेशमिया को सुनते हैं। झलक दिखला जा, झलक दिखला जा एक बार आजा आजा आजा आजा आ जा…
दीदार को तरसे अंखियां… सच में। कहां चला गया। ये शहर कभी मेरा अपना नहीं हो पाया लेकिन कम से कम वो तो था। कभी बात नहीं हुई लेकिन मुलाक़ात तो होती थी। नाम तक नहीं मालूम लेकिन ये तो मालूम है कि बारिश के समय वो भी ‘ ज़रा ज़रा’ सुनता है। उस दिन उसके एयरपोड्स कनेक्ट नहीं हुए थे फोन से और गाना बज गया था। बेचारा शर्मा गया था।
जैसे रोज़ सुबह सूरज को देख लेने से सवेरा होने का प्रमाण मिल जाता है, हर शाम उसको देख लेने के बाद दो सूरज होने का प्रमाण मिल जाता था।
चांद क्यूं नहीं बोला मैंने उसे? मुझे तो रात, शाम, चांद और उनके साथ आने वाला सुकून पसंद है। शायद अभी मुझे रात के ठहराव से ज़्यादा सुबह की हलचल की ज़रूरत है। हमने कभी एक दूसरे को ढंग से देखा तक नहीं है। जैसे मैं सिर्फ अपने इयरफोन की बात सुनती हूं वो भी सिर्फ अपने एयरपोड्स के भरोसे घर से निकलता है। लेकिन मुझे यकीन है कि जैसे मैंने उसे देखा है, समझा है, उसमें एक अपनापन महसूस किया है, उसने भी किया होगा।
एक ही बस से जाते तो शायद एक दिन हिम्मत कर के… क्या करती मैं? कुछ नहीं। जो इतमीनान दूर से देखने में है वो पास जाकर बैठने में कहां? अभी सिर्फ मैं हूं और जैसा मैं चाहती हूं वैसा वो। जिस दिन बात होने लगी उस दिन वो वो होगा और मैं मैं। अभी हम सिर्फ पवेलियन में बैठे दर्शक हैं। कोई भी जीते कोई भी हारे, हमारा मनोरंजन तय है। जिस दिन हम खुद मैदान में उतर गए, हार-जीत से फर्क पड़ने लगेगा।
आखिरी बार जब दिखा था बहुत परेशान लग रहा था वो। किसी से फोन पर कह रहा था, “नहीं हो रहा है भाई। सैलरी दे रहे हैं तो क्या हुआ दस घंटे थोड़े ही काम कर सकता है आदमी। साल भर से घर नहीं गया हूं। कल रिजाइन डाल रहा हूं …..हां मालूम है पिछले हफ्ते भी यही बोला था, लेकिन इस बार पक्का है।”
उसकी हालत भी कुछ-कुछ मेरे जैसी ही है। बस वो नौकरी से परेशान है, मैं नौकरी के लिए।
क्या है जिंदगी… एक तरह की परेशानियों से दूसरी तरह की परेशानियों की तरफ अग्रसर रहना, बस।
शायद उसे छुट्टी मिल गई, घर चला गया होगा। अच्छा है कोई तो खुश है। लेकिन वापस कब आएगा? क्या उसे पता है कि कोई उसका इंतजार कर रहा है यहां? क्या वो दोबारा कभी दिखेगा भी मुझे? “चलो सिवाय कॉम्प्लेक्स” पहुंच गए? गाना भी खत्म हो गया।
एक हफ्तेबाद
“बूंद-बूंद बरसूं मैं पानी-पानी खेलूं-खेलूं और बह जाऊं”
बारिश, बस स्टॉप, बस का इंतज़ार करते हुए लोग, दिन के रंगमंच पर रात का पर्दा गिरते हुए और अगले दृश्य की तैयारी में एक-एक कर के स्ट्रीट लाइट्स जलती हुई।
भोपाल की बारिश….किसी ने कहा था मुझसे भोपाल सबसे खूबसूरत बारिश में लगता है। सच है। आज बेहद खूबसूरत लग रहा है। शायद इसलिए की मैं जाने वाली हूं। ले लिया इंटर्नशिप लेटर। आज भी कह रहे थे, “अरे! कुछ दिन रुकती तो। बस जगह खाली होने ही वाली है। लेकिन आजकल के बच्चों को सब्र कहां। भागते रहते हैं इधर से उधर। मुहावरे नहीं पढ़े आपने सब्र का फल मीठा होता है।”
“पढ़े हैं सर लेकिन जब आपके आस पास के बागों के पेड़ फलों से लद जाते हैं तो डर सताने लगता है कि कहीं मीठा फल खाने के इंतज़ार में हम विफल ना हो जाए”, कहकर मैं चली आई।
घर जा रही हूं इसलिए शायद आज मन खुश है। एक बार घर से निकल जाने के बाद घर से एक अजीब सा रिश्ता बन जाता है। हर कुछ दिनों के बाद घर जाने का मन तो करता है लेकिन सिर्फ खुद को यह याद दिलाने के लिए कि हम यहां से क्यों निकले थे।
याद आते ही मैं भी वापस आ जाऊंगी। या फिर शायद उससे पहले ही आ जाऊं अगर ‘दूसरे नंबर’ के संस्थान से कॉल आ गया तो। ख़ैर मेरे लिए तो वो पहला ही होगा।
आज महसूस हो रहा है कि कभी कभी कुछ पाने से ज़्यादा खुशी होती है कुछ बदल जाने की।
इतना सुहाना मौसम….ये तो किशोर कुमार का आह्वान कर रहा है।
यूँ तो अकेला भी अक़सर गिर के सम्भल सकता हूँ मैं तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा दुनिया बदल सकता हूँ मैं
आज तो सूरज निकला ही नहीं सुबह से बारिश ही हो रही है।
सूरज!…मैं तो भूल ही गई थी। ये कबसे यहां बैठा है। क्या उसने मुझे देखा? नहीं शायद अभी आया है। इतना भारी बैग। स्टेशन से आ रहा है। घर गया था या शायद कहीं घूमने। छुट्टी मिल गई या नौकरी छोड़ दी?
पता नहीं लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान ‘कल फिर ऑफिस जाना है’ जैसी नहीं लग रही। या तो सच में खुश हैं या मैं सावन की अंधी हो चुकी हूं।
“चलो 7 नंबर, 10 नंबर, सिवाय।”
अरे ये बस…इतना जल्दी क्यों आना था इसे। एक नज़र ठीक से देख तो लेने देती, इसके बाद शायद ही दिखे। मैंने अपना रास्ता बदल लिया है और शायद उसने भी।
क्या उम्मीद कर रही हूं मैं? वो मुझे जानता तक नहीं। एक आखिरी बार दिख गया इतना ही बहुत है।
आज भी बस में बैठने की जगह नहीं है। बस की खिड़की से उसका आधा चेहरा दिख रहा है। उसकी बस आने में समय है अभी, इसलिए शायद बेंच पर जाकर बैठ गया। अब उसका पूरा चेहरा दिख रहा है। और वो हल्की सी मुस्कान…
अरे! अचानक वो मुस्कुराहट गायब क्यूं हो गई। जैसे किसी को देख कर चौंक गया हो। सिर नीचे कर के मेरी बस में किसी को।खोज रहा है शायद। मुझे? फिर से वो मुस्कान… नहीं इस बार हंसी है। मुझे देख कर हंसा वो। मानो मुझे मेरे ही वजूद का साक्ष्य दे दिया हो। लेकिन पहले कौन हंसा था? मैं या वो? क्या मैं इतनी देर से उसे देख कर मुस्कुरा ही रही थी?
बस चल दी।
इससे ज़्यादा क्या ही मांग सकती थी मैं? बहुत ज़्यादा फर्क नहीं है उस दिन के और आज के सफ़र में। आज भी कंधे पर भारी बैग है, बैठने को जगह नहीं है, लेकिन आज मन हल्का है। आज सबसे भागने का नहीं सबको सुनने समझने, देखने का मन हो रहा।
कितना समय और, फिर से हर चीज़ से ऊब जाने के लिए? जितना भी है उस ‘सब कुछ छोड़- छाड़ के भाग जाने’ वाले दौर पर भारी ही पड़ता है।
आज उदित नारायण के गाने हैं जो भी कसमें खाई थीं हमने वादा किया था जो मिलके…
आज सुनूंगी भी इयरफोंस की आड़ में छुपूंगी नहीं। लेकिन उससे पहले… यूँ ही बरस बरस काली घटा बरसे हम यार भीग जाएँ इस चाहत की बारिश में…
The pride month is about to end in a week and recently I found myself re-watching one of my favourite LGBTQ dramas. Will I pay heavens to make me experience the feeling of watching it for the first time again? Yes absolutely yes!
The drama that I’m talking about is called “I Told Sunset About You”, also known as ITSAY (yes, I couldn’t think of a better title for the blog). If you are a fan of Asian dramas then you have definitely heard of the BL genre. BL (Boys’ Love) shows although depict romantic relationships between men but are targeted towards teenage female audience. The genre has often been accused of wrongly portraying gay relationships.
Coming back to ITSAY, it is a Thai drama released in 2020, though marketed as a BL in the beginning but due to its realistic portrayal of same sex love and not following of conventional BL tropes, ITSAY is considered a LGBTQ coming of age drama. The story follows the lives of two teenage boys Teh and Oh-aew, played by Billkin and PP Krit respectively, who live in Phuket and are chasing their common dream of becoming actors. Teh and Oh-aew used to be childhood friends but had a fallout due to their shared dream forcing them to be competitors.
Finally, in the last year of school while preparing for University entrance exams Teh and Oh-aew meet again at Chinese language tutorial classes where Teh agrees to teach Oh-aew Chinese and their friendship blooms again. Teh is in love with a girl named Tarn who is also his classmate and they both have decided to start dating after entering University. The five episode drama then tells the story of both the boys exploring their identity, realising their love for eachother, chasing their dreams, while dealing with family pressure and teenage angst simultaneously.
As a coming of age drama, ITSAY portrays the complexities of a teenager’s mind really well. The struggle to strike a balance between what the heart wants as opposed to the mind and the constant fear of not being able to conform to the norms of the society makes up for a emotional roller coaster ride. Teh helping Oh-aew learn the Chinese language gives us some of the sweetest and heart fluttering scenes in the drama. The feelings of jealousy, helplessness and longing for eachother when a constant pressure of entering a prestigious University and making good career is lingering above them makes ITSAY relatable to many of us.
I can’t help but talk about a particular scene in the drama where the fear of loosing Oh-aew, the pressure to be up to the mark like his elder brother and several other things piled up together cause Teh to have a mental breakdown in the middle of writing his exam. Another heartbreaking scene is where Teh is struggling to come to terms with his sexuality and thus refrains from getting closer to Oh-aew. This prompts Oh-aew to try on a red bra as he wonders what he is lacking in? Why is he not enough for Teh to love him back?
A still from ITSAY
Talking about ITSAY and not appreciating its soundtrack and cinematography is soon going to be counted in top ten gravest sins one could commit in their life. The soundtrack is as memorable as the show itself, with each score resonating with various human emotions. My personal favourite is “Home Coming”. As for the cinematography, I will just say that ITSAY feels like a trip to Phuket with your two favourite people.
I can keep on writing paragraphs about the brilliance of this drama, it’s storyline, acting, direction, music and everything else but that will make this blog extraordinarily long. So, if you want to fall in love with beaches, sunsets, hibiscus, coconuts, the colors red and blue, and reminisce about your teenage love then please watch ITSAY without wasting another minute.
ITSAY is followed by a 14-minute short film, titled Last Twilight in Phuket and a second season called I Promised You The Moon.
His love was like a treat Had me begging for more at each step, I thought I was climbing up a ladder It was a clifftop of unfathomable depth.
Do not leave me here in this maze For I am unaware of these ways.
Yes, I committed the sin of opening up, But my alibi is your assurance and my trust.
You took me up and up till the ground disappeared into clouds, Wandering in the sky I felt like a kite. Between a bird and a kite one is dependent on thread, And oh dear how did you forget that I am afraid of heights?
My head hangs low admitting it’s a point of no return for me, We either move together or, if you set me free, You might not have any regret, not even it’s whiff, But I will have no other choice but to jump off the cliff.