Girl in the mirror

Pic credit: Pinterest

I am so proud of her
The way she is holding up
By herself, gulping it all
Like poison in a silver cup.

The falls, the jumps, the heartbreaks
Sewed her pillow with jewels
Cause no shoulder was worthy enough
Of the tears that could fill pools.

Pitying yourself is the worst
Asking what led to this hell
She picked up others from the mud
Failed to get up when herself fell.

Even when on the ground
The passerine loved the sky
A broken bone and dirty skirt
She stood up again for another flight.

To hide the ugly swollen eyes
She adorned her face with a smile
The loveliest faces are always those
Getting eaten away from inside.

‘Just another 24 hours’
She imitated from behind the mirror
Oh! I am so proud of her
My sweet little silly dreamer.

तोहफ़े में दी हुई किताब

Pic credit: Pinterest

न जाने किस मनहूस घड़ी में मुझे उस पर इतना प्यार आया था कि उसे अपनी पसंदीदा किताब तोहफ़े में दे दी। आज न वो किताब मेरे पास है, न वो इंसान। लेकिन उस लम्हे को मनहूस कहना सही नहीं है। कुछ तो सोचा होगा मैंने। शायद ये कि क्या पता वो जल्द ही पढ़ कर वापस कर देगा या फिर ये कि हम इतने लंबे समय तक साथ रहेंगे कि किताब उसके पास हो या मेरे, एक ही बात होगी।

मुझे पीछे मुड़ कर देखना पसंद नहीं है, क्योंकि मुझे कमज़ोर नहीं साबित होना। फिर भी सब कुछ खत्म हो जाने के बाद भी जब उसने एक बार मिल लेने को कहा तो मैं मान गई। स्वार्थी हो गई थी मैं। सोचा बातों-बातों में किताब का ज़िक्र कर दूंगी तो वो खुद ही वापस लौटा देगा। एक बार को सोचा भी नहीं कि ये कितनी ओछी हरकत होगी।

मुझे बस अपना एक टुकड़ा ऐसे इंसान के पास छोड़ना नागवार गुज़र रहा था जो मुझे कभी समझ ही नहीं पाया।

वो कोई नई किताब नहीं थी। बाज़ार से महंगी से महंगी चीज़ खरीद कर लाना और किसी को दे देना आसान होता है। क्योंकि वो चीज़ अभी आपकी नहीं हुई होती है। उसमे जान नहीं होती है। उसमें आप नहीं होते हैं।

वो किताब मेरी थी, मैंने पढ़ी थी, अपनी पसंदीदा पंक्तियां रेखांकित की थीं और शायद कुछ लिखा भी होगा। शायद वो कभी समझ नहीं पाया कि किसी को अपनी मनपसंद किताब तोहफ़े में देने का क्या मतलब होता है।

हम कभी नहीं मिले दोबारा। अब मेरी किताब हमेशा उसके पास रहेगी। ‘मेरी’ इसलिए कह रही हूं क्योंकि उसके पहले पन्ने पर मेरा नाम लिखा है। एक नाकाम कोशिश उसपर अपना हक जमाने की। काश इतना आसान होता किसी को अपना बनाना, बस नाम लिख दो।

दिलचस्प बात है कि उस किताब में उसका नाम भी है। मैंने नहीं लिखा है, पहले से ही था। उस कहानी का एक हिस्सा।

उस कहानी का एक वाक्या बखूबी याद है मुझे। उसका मतलब भी अब ज़्यादा बेहतर समझ में आता है।

हुआ कुछ यूं था कि खां साहब फुन्नन मियां को अपनी ग़ज़ल सुना रहे थे। लेकिन इस ग़ज़ल के एक शेर को सुन कर फुन्नन मियां चौंक पड़े और बोले, “साहब हम कोनो पढ़े लिखे त हैं नहीं। बाकी आशिक के वास्ते सर उठाने का महावरा कुछ समझ में न आया। ऊ सर कटा सकता है, मंसूर बनकर, सरमद बनकर। ऊ ईसा बनकर सूली पर चढ़ सकता है। बाकी ऊ सर नहीं उठा सकता। सर उठाना तो मोहब्बत का कच्चापन साबित करता है, जैसे ऊ को अपनी मोहब्बत की अकड़ है।”

शायद हमारी मोहब्बत में भी कच्चापन था।

Empty

Pic credit: Pinterest

I imagined a piece of flesh hanging from the ceiling
In the blankness of the mind it fitted in right

How long has it been there?

It will take them days to realise
Who will look for me, who will be the first one to find?

The train of thoughts was moving fast skipping all the junctions
I pulled the chain and got off at some random location

Time to eat, the stomach said
Will have to cook, said the mind
The train consumed all the fuel, I can’t wake up, not even as much as to switch on the light

Let it be then both agreed
It’s anyways not unbearable
And what’s the point of throwing food
First get accustomed to cooking for one person

Last night I broke into tears while laughing hysterically on a joke
It’s no mood swings, not my periods
Just the echo of my laugh that makes me choke

People ask me to ‘make’ friends
Are they some craft? How do I make them?
Or may be this is how it was always done?
I just failed to learn the art, not even in decades

Now the blushing sky tells me the sun is almost here
Then the knocking on my eyelids must be some sleep
Take a nap before the train departs again
And takes you on an endless journey of emotions like some forest deep.

The Youngest One

Pic credit: Pinterest

The pampered, the spoiled, the privileged one,
Yes you guessed it right, I am the youngest one.

My sister’s wardrobe is my wardrobe, but my wardrobe is not hers,
Shoes, lunch box I don’t buy anything, I always get them from others.

And my brother of course is so protective almost like a father figure,
Whatever I want I just take it, coz mom says, “She is younger no…let her.”

But being the youngest is not all rainbows and sunshine,
You could be twenty three and treated like nine.

And just like the closet which never get empty My heart is always filled with insecurities.

Yes, luckily enough I wasn’t the experimental child,
Mom and dad learning parenting with you must have been wild.

But then how did you turn to be so damn perfect,
It’s like they molded and shaped you exactly how they wanted.

Now how am I supposed to match your excellence,
I am tired of these comparisons, somebody show them the difference.

Please don’t think I am not thankful to you for paving the way,
I’m just trying to figure out my identity, my own pathway.

Above all the biggest curse of being the youngest kid,
Is feeling in 20s what my siblings might in 30s mid.

By default I will get to spend the least time with my parents,
Like writing this poem while scared of their sudden disappearance.

The lost, the neglected, the insecure one,
Allow me to introduce myself, I am the youngest one.

बस स्टॉप

Pic credit: Pinterest

धूप आए तो छांव तुम लाना
ख्वाइशों की बारिशों में भीग संग जाना

“चलो साई बोर्ड, 10 नंबर, सिवाय कॉम्प्लेक्स”, चलती बस से उतरकर कंडक्टर चिल्ला रहा है।

आ गई बस। तिल रखने की भी जगह नहीं है। लेकिन अभी कम से कम 15 सवारी और चढ़ सकती हैं। और चढ़ेंगी। क्योंकि नहीं चढ़ेंगी तो कैसे जाएंगी?

रोज़ की तरह मैं भी उस नई माचिस की डिब्बी नुमा बस में चढ़ गई जो नाक तक भरी होने की वजह से खुल नहीं पाती।

बाहर से देखने वालों को लगेगा कि इस बस में सीटें हैं ही नहीं। जिसको जहां जगह मिली वहां खड़ा हो गया। मैं भी।

कंधे पर लैपटॉप वाला बैग एक हाथ में किराया और दूसरे हाथ से हैंगर पकड़ने के बाद समझ नहीं आ रहा था कि कैसे जेब से फोन निकालकर अरिजित सिंह की आवाज़ तेज करूं ताकि बस वाले के पसंदीदा कुमार सानू की आवाज़ मुझे सुनाई न दे।
कुमार सानू से कोई गुरेज़ नहीं है मुझे लेकिन अभी मैं दुखी हुं और बेहद परेशान भी, ऐसे में कुमार सानू का हँस के आशिकी के लिए बस एक सनम तलाश करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा। अब ये कमबख्त इयरफोंस बदल लेने चाहिए मुझे। कोई बटन काम नहीं करता इनमें…

और तभी अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे पेट में किसी ने चाकू घुसेड़ दिया और अब वो उसे दाएं-बाएं दाएं-बाएं घुमा रहा है। मुझे अपने शरीर से खून बहता हुआ भी महसूस हुआ…

पीरियड्स। पहला दिन।

जिया जाए ना जाए ना जाए ना…
चांद की ज़रूरत हो जैसे चांदनी के लिए…

“हां बोलो”, कंडक्टर ने टिकट के लिए पैसे मांगे। इस कंडक्टर का आज पहला दिन है शायद। इसे अभी हर जगह का किराया अपने बच्चों के नाम की तरह याद नहीं है। हाथ में रेट लिस्ट ले के घूम रहा है।

काम पर पहला दिन…और तीन महीने के बाद पहला दिन… उफ्फ।

टिकट लेने के बाद बस में सफ़र करने का पहला पड़ाव पूरा हुआ और मेरा एक हाथ भी खाली हो गया जिससे मैंने अरिजित सिंह को थोड़ी ऊंची आवाज़ में गाने के लिए प्रेरित किया।

अब इस बस में ठूंसे हुए 50 लोगों से मुझे कोई मतलब नहीं था। सिर्फ मैं, अरिजित, और वो..

आज भी नहीं दिखा वो। चार दिन हो गए। कहां चला गया? तीन महीने हो गए यहां इंटर्नशिप करते हुए, आज तक सिवाय हर शनिवार के किसी दिन ऐसा नहीं हुआ कि वो दिखा ना हो।

तीन महीने….अब घुटन हो रही है यहां।
काम सिखाने के नाम पर बंधुआ मजदूर बना लेते हैं। नौकरी का लालच देके, एक्सपीरियंस नाम की लॉलीपॉप थमा के सारा काम करवाने लगते हैं। लेकिन हर दुविधा का हल होता है। यहां भी है। छोड़ दे। मत कर । किसने बोला? आखिर मेंटल हेल्थ नाम की भी एक चीज़ होती है।
हां होती तो है लेकिन साला बहुत हाई मेंटेनेंस चीज़ है। प्रैक्टिकल नहीं है। और जो प्रैक्टिकल नहीं है वो ज़रूरी नहीं है।

कैसे छोड़ दूं? ड्रीम जॉब ड्रीम कंपनी, ऐसा कुछ भी तो होता है न। मिल जाएगी नौकरी, बहुत आसानी से, दूसरे नंबर के संस्थान में। ऐसा सब बोल रहे हैं। लेकिन इस निर्लज्ज ‘उम्मीद’ नाम की चिड़िया का क्या करूं जो हर दिन अपनी बहन ‘आशा’ के साथ मेरे हारे हुए मन के टूटे-फूटे झरोखे पे गाना गा के जाती है।

क्या पता आज वो दिन हो जब सर बोले, “कल से ज्वाइन कर लेना।” कहीं मैं ज़रा सी मेहनत से चूक न जाऊं। कहीं मेरा च…
चांदनी रात में, गोरी के साथ में…
ये अरिजित सिंह के बीच में टोनी कक्कड़ कहां से आ गया। स्पोटिफाई भले ही मेरी पसंद-नापसंद को मेरे मां बाप से ज़्यादा जानता हो, लेकिन कभी-कभी ये भी गलती कर देता है।

अरे मम्मी! ड्राइवर ने अचानक से ब्रेक लगा दिया। सामने वाली लड़की से इतनी तेज सिर टकराया की लगा चश्मा आँखों में समा जाएगा। स्कूटी वाला मरते-मरते बचा है। लेकिन मजाल की ड्राइवर अपनी गलती मान ले। आज की आखिरी बस है ये जितनी जल्दी ड्राइवर को घर जाने की है उतनी इस बस में शायद ही किसी और को होगी। थोड़ी बहुत नोंक-झोंक के बाद बस फिर से चल दी।

मम्मी घर बुला रही हैं, हमेशा की तरह। जाने का मन भी हो रहा है। लेकिन इस बार भी बिना कुछ हासिल किए नहीं जा सकती। क्या जवाब दूंगी जब पापा पूछेंगे क्या मिला ये कोर्स कर के? “पता तो मुझे भी नहीं है पापा, मैं भी इंतज़ार ही कर रही हूं कुछ मिलने का।”

तीन साल बर्बाद कर दिए क्या इस कोर्स में? नीट, बी.टेक में से ही कुछ कर लेना था। कम से पता तो रहता कि दूसरा ऑप्शन पंखा है। थोड़ी सहानुभूति भी मिल जाती कि इतना प्रेशर रहता है पढ़ाई का, क्या करे बेचारा बच्चा। इस फील्ड में तो पढ़ाई का प्रेशर भी नहीं, कोर्स भी खुद ही चुना था। और पत्रकारिता के छात्रों को तो पहले से ही फेलियर समझा जाता है। कुछ नहीं मिल रहा था तभी यहां आए हैं। नहीं… सब कुछ मिल रहा था तब भी यहां आए हैं… क्योंकि…क्योंकि शायद दिमाग खराब था।

यहां आप लाख पढ़ने में अच्छे हों फिर भी फ्लॉप साबित हो सकते हैं। मेहनत से ज़्यादा टैलेंट की लड़ाई है। अब कहां से लाऊं वो टैलेंट जो तीन साल पहले मुझे लगा था कि मेरे अंदर है। और शायद है भी पर काफी नहीं है।

छोड़ो हटाओ यार, हिमेश रेशमिया को सुनते हैं।
झलक दिखला जा, झलक दिखला जा
एक बार आजा आजा आजा आजा आ जा

दीदार को तरसे अंखियां… सच में। कहां चला गया। ये शहर कभी मेरा अपना नहीं हो पाया लेकिन कम से कम वो तो था। कभी बात नहीं हुई लेकिन मुलाक़ात तो होती थी। नाम तक नहीं मालूम लेकिन ये तो मालूम है कि बारिश के समय वो भी ‘ ज़रा ज़रा’ सुनता है। उस दिन उसके एयरपोड्स कनेक्ट नहीं हुए थे फोन से और गाना बज गया था। बेचारा शर्मा गया था।

जैसे रोज़ सुबह सूरज को देख लेने से सवेरा होने का प्रमाण मिल जाता है, हर शाम उसको देख लेने के बाद दो सूरज होने का प्रमाण मिल जाता था।

चांद क्यूं नहीं बोला मैंने उसे? मुझे तो रात, शाम, चांद और उनके साथ आने वाला सुकून पसंद है। शायद अभी मुझे रात के ठहराव से ज़्यादा सुबह की हलचल की ज़रूरत है।
हमने कभी एक दूसरे को ढंग से देखा तक नहीं है। जैसे मैं सिर्फ अपने इयरफोन की बात सुनती हूं वो भी सिर्फ अपने एयरपोड्स के भरोसे घर से निकलता है। लेकिन मुझे यकीन है कि जैसे मैंने उसे देखा है, समझा है, उसमें एक अपनापन महसूस किया है, उसने भी किया होगा।

एक ही बस से जाते तो शायद एक दिन हिम्मत कर के… क्या करती मैं? कुछ नहीं। जो इतमीनान दूर से देखने में है वो पास जाकर बैठने में कहां? अभी सिर्फ मैं हूं और जैसा मैं चाहती हूं वैसा वो। जिस दिन बात होने लगी उस दिन वो वो होगा और मैं मैं। अभी हम सिर्फ पवेलियन में बैठे दर्शक हैं। कोई भी जीते कोई भी हारे, हमारा मनोरंजन तय है। जिस दिन हम खुद मैदान में उतर गए, हार-जीत से फर्क पड़ने लगेगा।

आखिरी बार जब दिखा था बहुत परेशान लग रहा था वो। किसी से फोन पर कह रहा था, “नहीं हो रहा है भाई। सैलरी दे रहे हैं तो क्या हुआ दस घंटे थोड़े ही काम कर सकता है आदमी। साल भर से घर नहीं गया हूं। कल रिजाइन डाल रहा हूं …..हां मालूम है पिछले हफ्ते भी यही बोला था, लेकिन इस बार पक्का है।”

उसकी हालत भी कुछ-कुछ मेरे जैसी ही है। बस वो नौकरी से परेशान है, मैं नौकरी के लिए।

क्या है जिंदगी… एक तरह की परेशानियों से दूसरी तरह की परेशानियों की तरफ अग्रसर रहना, बस।

शायद उसे छुट्टी मिल गई, घर चला गया होगा। अच्छा है कोई तो खुश है। लेकिन वापस कब आएगा? क्या उसे पता है कि कोई उसका इंतजार कर रहा है यहां? क्या वो दोबारा कभी दिखेगा भी मुझे?
“चलो सिवाय कॉम्प्लेक्स”
पहुंच गए? गाना भी खत्म हो गया।

एक हफ्ते बाद

“बूंद-बूंद बरसूं मैं
पानी-पानी खेलूं-खेलूं और बह जाऊं”

बारिश, बस स्टॉप, बस का इंतज़ार करते हुए लोग, दिन के रंगमंच पर रात का पर्दा गिरते हुए और अगले दृश्य की तैयारी में एक-एक कर के स्ट्रीट लाइट्स जलती हुई।

भोपाल की बारिश….किसी ने कहा था मुझसे भोपाल सबसे खूबसूरत बारिश में लगता है। सच है। आज बेहद खूबसूरत लग रहा है। शायद इसलिए की मैं जाने वाली हूं। ले लिया इंटर्नशिप लेटर। आज भी कह रहे थे, “अरे! कुछ दिन रुकती तो। बस जगह खाली होने ही वाली है। लेकिन आजकल के बच्चों को सब्र कहां। भागते रहते हैं इधर से उधर। मुहावरे नहीं पढ़े आपने सब्र का फल मीठा होता है।”

“पढ़े हैं सर लेकिन जब आपके आस पास के बागों के पेड़ फलों से लद जाते हैं तो डर सताने लगता है कि कहीं मीठा फल खाने के इंतज़ार में हम विफल ना हो जाए”, कहकर मैं चली आई।

घर जा रही हूं इसलिए शायद आज मन खुश है। एक बार घर से निकल जाने के बाद घर से एक अजीब सा रिश्ता बन जाता है। हर कुछ दिनों के बाद घर जाने का मन तो करता है लेकिन सिर्फ खुद को यह याद दिलाने के लिए कि हम यहां से क्यों निकले थे।

याद आते ही मैं भी वापस आ जाऊंगी। या फिर शायद उससे पहले ही आ जाऊं अगर ‘दूसरे नंबर’ के संस्थान से कॉल आ गया तो। ख़ैर मेरे लिए तो वो पहला ही होगा।

आज महसूस हो रहा है कि कभी कभी कुछ पाने से ज़्यादा खुशी होती है कुछ बदल जाने की।

इतना सुहाना मौसम….ये तो किशोर कुमार का आह्वान कर रहा है।

यूँ तो अकेला भी अक़सर गिर के सम्भल सकता हूँ मैं
तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा दुनिया बदल सकता हूँ मैं

आज तो सूरज निकला ही नहीं सुबह से बारिश ही हो रही है।

सूरज!…मैं तो भूल ही गई थी। ये कबसे यहां बैठा है। क्या उसने मुझे देखा? नहीं शायद अभी आया है। इतना भारी बैग। स्टेशन से आ रहा है। घर गया था या शायद कहीं घूमने। छुट्टी मिल गई या नौकरी छोड़ दी?

पता नहीं लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान ‘कल फिर ऑफिस जाना है’ जैसी नहीं लग रही। या तो सच में खुश हैं या मैं सावन की अंधी हो चुकी हूं।

“चलो 7 नंबर, 10 नंबर, सिवाय।”

अरे ये बस…इतना जल्दी क्यों आना था इसे। एक नज़र ठीक से देख तो लेने देती, इसके बाद शायद ही दिखे। मैंने अपना रास्ता बदल लिया है और शायद उसने भी।

क्या उम्मीद कर रही हूं मैं? वो मुझे जानता तक नहीं। एक आखिरी बार दिख गया इतना ही बहुत है।

आज भी बस में बैठने की जगह नहीं है। बस की खिड़की से उसका आधा चेहरा दिख रहा है। उसकी बस आने में समय है अभी, इसलिए शायद बेंच पर जाकर बैठ गया। अब उसका पूरा चेहरा दिख रहा है। और वो हल्की सी मुस्कान…

अरे! अचानक वो मुस्कुराहट गायब क्यूं हो गई। जैसे किसी को देख कर चौंक गया हो। सिर नीचे कर के मेरी बस में किसी को।खोज रहा है शायद। मुझे? फिर से वो मुस्कान… नहीं इस बार हंसी है। मुझे देख कर हंसा वो। मानो मुझे मेरे ही वजूद का साक्ष्य दे दिया हो। लेकिन पहले कौन हंसा था? मैं या वो? क्या मैं इतनी देर से उसे देख कर मुस्कुरा ही रही थी?

बस चल दी।

इससे ज़्यादा क्या ही मांग सकती थी मैं? बहुत ज़्यादा फर्क नहीं है उस दिन के और आज के सफ़र में। आज भी कंधे पर भारी बैग है, बैठने को जगह नहीं है, लेकिन आज मन हल्का है। आज सबसे भागने का नहीं सबको सुनने समझने, देखने का मन हो रहा।

कितना समय और, फिर से हर चीज़ से ऊब जाने के लिए? जितना भी है उस ‘सब कुछ छोड़- छाड़ के भाग जाने’ वाले दौर पर भारी ही पड़ता है।

आज उदित नारायण के गाने हैं
जो भी कसमें खाई थीं हमने
वादा किया था जो मिलके…

आज सुनूंगी भी इयरफोंस की आड़ में छुपूंगी नहीं। लेकिन उससे पहले…
यूँ ही बरस बरस काली घटा बरसे
हम यार भीग जाएँ इस चाहत की बारिश में

The road taken and the consequences

Pic Credit: Pexels

Its a never ending battle. It’s not even a battle actually for it never makes you extremely scared, not for your life, not anything else. It just suffocates you. It’s so difficult to know things expecially about yourself. Other people can tell you about themselves but who is gonna tell you about yourself? What do you want to be in life? Why is it even necessary to be something? For money? For passion?

Who knows and honestly no one cares. It’s actually crazy to me how our interests keep changing over time.

Remember deciding your profession solely based on the last movie you watched? If you loved the movie, then, for sure you wanted to take up whatever profession the lead character was in.

You realise your skills by the time you reach High School and then leave behind your fancy dreams. Then comes the realisation of competition in this world and the pressure from your parents. That makes you drop some dreams. And finally, ‘money’, the most ‘important’ aspect of life. After all, what is the point of being in a profession, though your favourite, that doesn’t fill your stomach?

It’s almost like life gets narrower as you grow old. Fewer dreams, fewer friends, fewer expectations.

There is a funny part to all of this as well. You won’t find out till you actually step into it. If you think that you can decide what you want to be in life in a day by just sitting and thinking about it, you are wrong. You will have to pick up a path. It can even be the path that ‘Robert Frost’ did not take, but you must walk. You will feel like wasting your time or might actually enjoy it, but the point is, you won’t find out till you actually do one thing or the other.

It’s time taking for sure or euphemistically speaking, demands patience and is heavily dependent on the ‘Its never too late’ concept.
And you know what, it’s extremely difficult to even try to end a piece of writing on a positive note when your soul itself is confused and still figuring things out. But, I am glad that atleast I am walking whether it is the right or the wrong path.

Making Peace

I remember when it felt unbearable.
The silence I yearned forever,
Was distinctly audible.
Is that how it feels being vulnerable?
Tears rolling down everywhere,
bedsheets, toilet, dining table.

‘But it’s good for you’, I told my reflection.
‘You are a big girl now,
Stop craving for attention’
Sometimes being alone brings perfection.
“You chose it for yourself why cry now?”
Said someone for whom I had greatest affection.

So I began to wait to get used to it eventually.
Like the first time I wore specs,
Didn’t like them immediately.
If it were a battle I would’ve fought courageously.
But Ashoka seeks Buddha,
When victory is celebrated regretfully.

Some affairs demand you yield.
I know I will be called a loser,
If ever, my secret is revealed.
Yes I surrendered, I bowed down, I kneeled.
For all I know and care about,
Is the pain will slowly get healed.

Home sick

Pic credit: Pinterest

Remember the day you took off from the nest
Dusting off your feathers resolved to never rest,

Until you reach the dream destination stuck in your mind,
The road leading upto it, you knew you would find.

What you thought to be a desert turned out to be a farm,
Thousands of young saplings each with its own charm,

And somewhere on the road among the charm of strangers,
You lost your way and got introduced to new dangers.

Now far away from home, but farther away from stop,
Forget blockbuster, “what if I flop?”

It’s like running out of fuel in the middle of the road,
No matter where you’re headed to, you miss your abode.

Subconsciously looking for the option of going back,
It prolly wouldn’t hurt much to unpack the bags.

But, brood strokes fear of being held in the name of embrace,
Otherwise it’s still easier to follow someone else’s trace.

Now that’s where begins the journey addiction,
You gotta keep moving with o’ without conviction.

Of reaching atleast somewhere, now that there’s no comfort zone,
Afterall what’s worse than being home sick, is being sick of home.