
लाल, पीली, हरी, गुलाबी, नीली साड़ियों में सजी औरतें। घुटने तक पानी में हाथ जोड़े खड़े होकर, नाक से सिर तक नारंगी रंग का सिंदूर लगाए लगभग उसी रंग के सूरज के उगने का इंतज़ार कर रही थीं। फल-फूल, ठेकुआ से भरे सूप-दउरा और किसी भी त्योहार में अति-उत्साहित रहने वाले बच्चों के बीच घाट पर तिल रखने की भी जगह नहीं थी। जहां तक नज़र जाती, कोसी भरने के लिए बाँधे गए गन्नों के बीच लोग ही लोग नज़र आ रहे थे और दूर खड़ी एक गगनचुंबी इमारत जिसने संभवतः व्रतियों के 36 घंटे के उपवास को कुछ मिनट और बढ़ा दिया था।
उस इमारत पर एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था। “डेंगू मलेरिया के साथ चांस लेंगे या ऑल आउट?”
आग लगे उस मच्छर को जिसने मम्मी को काटा। खून बिना तड़प-तड़प कर मरे। जब से होश संभाला है ये सिर्फ दूसरी दफा था जब घर में छठ पूजा नहीं हुई क्योंकि मम्मी को डेंगू हो गया था। दूसरी दफा इसलिए क्योंकि पहली बार उस साल था जब छठ से कुछ ही दिन पहले नाना गुज़र गए थे। तब तो नाना के चले जाने का दुख इतना बड़ा था कि छठ कब आई और चली गई पता ही नहीं चला। लेकिन अब जब घर, छुट्टी और त्योहार पर्यायवाची हो चुके हैं घर में फलों का जमावड़ा न लगना, लौकी भात और खीर रोटी न बनना कुछ ज़्यादा ही खल रहा था।
जैसे ही किसी को पता लगता है कि हमारे यहाँ छठ होती है उस व्यक्ति के मन में ढेर सारे सवाल आते हैं, जैसे कि, “ठेकुआ तो मिलेगा ना?”, “तुम लोग नाक से सिंदूर क्यों लगाते हो?”, और “तुम बिहारी हो क्या?”
नहीं, हम यूपी से हैं। और हमारे यहाँ भी छठ मनाई जाती है। क्योंकि यूपी, बिहार, झारखंड होंगे 74, 112 और 24 साल पुराने लेकिन ये पर्व इतना पुराना है कि इसे सालों पहले ही प्राचीन की उपाधि दी जा चुकी है और त्योहार किसी राजनीतिक लकीर के मद्देनज़र नहीं मनाए जाते हैं।
मुझे हमेशा लगता था कि मम्मी हमें खुश करने के लिए झूठ बोलती हैं जब वो कहती हैं कि छठ का व्रत अपने बच्चों के लिए रखा जाता है, पूरे परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है, ना कि सिर्फ लड़कों के लिए। अगर ऐसा नहीं था तो मामा, चाचा, भैया सबके पैदा होने की, नौकरी लगने की मन्नतें क्यों मांगी गई थीं और मौसी, बुआ, दीदी और शायद मेरी भी सिर्फ शादी की।
अपनी बात का प्रमाण देने के लिए मम्मी हमेशा शारदा सिंहा का वो गीत गा कर सुना देती थीं, “केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके झुके”। गीत की आखिरी कुछ पंक्तियों में जब व्रती से पूछा जाता है कि वो छठ का व्रत किसके लिए कर रही है तो वो बताती है, “हमरो जे बेटी कवन ऐसी बेटीया से उनके लागी।” शारदा सिंहा अब नहीं रहीं लेकिन इस बार भी जब ये विवाद उठा तो मम्मी ने उनके गीतों के माध्यम से अपनी बात साबित की।
छठ क्यों मनाई जाती है इस बात से कभी कुछ खास फ़र्क पड़ा नहीं क्योंकि मन्नत त्योहार का एक छोटा सा हिस्सा होती है। लोग दिवाली की पूजा भी धन प्राप्ति के लिए करते हैं लेकिन मन में उत्साह नए कपड़े, मिठाइयां और जगमगाते दियों के लिए होता है।
वो उत्साह मम्मी ने देखा होगा हमारी आंखों में जब हम अपनी नौकरियों से छुट्टी लेकर घर पर बैठे थे और उनके गिरते हुए प्लेटलेट्स को बढ़ाने की तरकीबें सोच रहे थे। “ठीक हो गइल बानी अब भूख जा तानी,” उन्होंने पपीते के पत्ते के कड़वे रस को किसी तरह अपने गले से नीचे उतारते हुए बोला। इस औरत के शरीर में 60 हज़ार प्लेटलेट्स बची हैं, हीमोग्लोबिन की कमी है और लाल चकतों ने हाथ, मुंह और पैर को घेर रखा है फिर भी ये व्रत रखने को तैयार है सिर्फ अपने बच्चों की खुशी के लिए।
हमने अपनी माँओं पर कुछ ज़्यादा ही बोझ डाल रखा है सबकी खुशियों के बारे में सोचने का। वरना ऐसा नहीं है कि छठ सिर्फ औरतें करती हैं, मर्द भी करते हैं। सालों पहले देखा था जब गाँव के पोखर में, कोहरे से ढकी सुबह में, हाथ में सूप लिए, पीले रंग की धोतियां पहने पाँचों नाना उगते सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। छठ के समय कोहरा, पोखर में पानी और अर्घ्य देते हुए आदमी अब विरले ही दिखते हैं।
इस सारी उथल पुथल के बीच यह भी याद आया कि बात सिर्फ किसी बीमारी की नहीं है। माँ अब लगभग 60 साल की हो चुकी हैं। आखिर कितने दिन और हम दूसरे शहर से अपने बसता बाँध कर छठ मनाने आएंगे? विदेशों में बसे हुए यूपी, बिहार के लोगों और इंस्टाग्राम रील्स के माध्यम से छठ तो हर घर में पहुंच गई, लेकिन उन घरों में छठ की क्या विरासत होगी जहाँ के बच्चे शहरों के हिसाब से कुछ ज़्यादा देहाती और देहात के हिसाब से कुछ ज़्यादा शहरी हो गए हैं?


